ज्योतिषीय दृष्टिकोण में सुःख एवं दुःख
ज्योतिषीय दृष्टिकोण में सुःख एवं दुःख भारतीय ज्योतिष के अनुसार किसी के भी जीवन में सुःख एवं दुःख से सम्बंधित जो भी प्राप्ति होती है वह जन्मकालीन योग एवं ज्योतिषीय महादशा, अंतरदशा, प्रत्यन्तर्दशा और इनके ग्रहों के गोचर के ऊपर ही निर्भर रहती है... लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि इंसान के जीवन में चाहे कोई भी दशा हो और ग्रह गोचर कैसा भी हो एवं कुंडली में कोई भी योग हो और चाहे कितनी भी संख्या में योग हों, अधिकतम सुख 40% और न्यूनतम दुःख 60% ही निर्धारित है...! -------------------------------- अधिक स्पष्टता के लिए, सदैव स्मरण रहे कि, ज्योतिषीय व्यवस्था में किसी के भी जीवन में अधिकतम सुख 40% ही निर्धारित है अर्थात कोई भी व्यक्ति इससे अधिक तो दूर की बात है इतना भी नहीं पा सकता है... और न्यूनतम दुःख 60% ही निर्धारित है अर्थात इस सीमा को कोई भी व्यक्ति कम नहीं कर सकता बल्कि इसमें बृद्धि ही करता है...! उपरोक्त दोनों स्थितियां सभी ग्रहों के उनके सभी बारह भावों में गोचर पर निर्धारित होती हैं ...! ------------------------------------ उदहारण के लिए सूर्य ग्रह अपने गोचर के समय में एक राशि म...